छप छप
आँगन चोरो की गठरी.
तुम बिन जंगल निपट वीरान, तुम बिन चाँद बूरा,
तुम बिन स्वास निष्प्राण , तुम बिन जीवन कांच का चूरा .
तुम बिन सपने घपले घपले , तुम संग अपने लगते अपने,
तुम बिन कमरों के टूटे टखने , तुम संग दरवाजे और खिरकी बहने बहने .
तुम बिन भरने लगते आँहो के कूवे, तुम संग लुटते बाँध के गहने,
तुम बिन जीवन खट्ठी इमली की बासी चटनी, तुम संग जीवन पूवा पकोरा .
तुमने भर दी मेरी हसने की टपरी
अब ना आये, अब न छाए बादल काले घनरे.
न समझो मुझे रिश्तेदारों की उलट पहेलिया, मैंने तो अलमारी से निकाल दो घूट हैं पी ली.
बरखा के गीले मौसम में तुम मेरी अदरक की चाय और मैं तुम्हारी काली छतरी.

Tumhari nazm mein doob kar aise halka sa lag raha hai,
ReplyDeleteke jaise jism se sainkdon jism utar gaye hain
ke rooh se jaise jism ka bojh hat gaya hai...
Bahut khoob dost...
Look fwd to read more posts...